उनको ये शिकायात है में बेवफ़ाई पे नहि लिखता,
और में सोचता हूँ, उनकी रुसवाई पे नहीं लिखता...
खुद अपने से ज्यादा बुरा ज़माने में कोन है,
मै इस लिए औरों की बुराई पे नहीं लिखता...
कुच तो आदतों से मजबूर है, और खुद फितरतो की पसंद है,
ज़ख्म कितने भी गहरे हो, मै उनकी दुहाई पै नहीं लिखता...
शान-ए-अमीरी पे करू अर्ज़, मगर एक रूकावट है,
मेरे उसूल है, में गुनाहों की कमी पे नहीं लिखता...
समंदर को परखने का मेरा नजरिया हि अलग है यारों,
मिजाजो पे लिखता हूँ, उनकी गहेरइयो पे नहीं लिखता...
दूनिया का क्या है? हर हाल मै इलज़ाम लगाती है,
वरना क्या बात की मै अपनी सफाई पे नहीं लिखता...
तजुर्बा मेरी महोब्बत का ना लिखने की वजह बस यही है की,
शायर इश्क में खुद अपनी तबाही पे नहीं लिखता...
इससे ज्यादा क्या लिखो, जनता हूँ ज़माने को,
अपने पे लिखता हूँ, दुनियादारी पे नहीं लिखता...
और में सोचता हूँ, उनकी रुसवाई पे नहीं लिखता...
खुद अपने से ज्यादा बुरा ज़माने में कोन है,
मै इस लिए औरों की बुराई पे नहीं लिखता...
कुच तो आदतों से मजबूर है, और खुद फितरतो की पसंद है,
ज़ख्म कितने भी गहरे हो, मै उनकी दुहाई पै नहीं लिखता...
शान-ए-अमीरी पे करू अर्ज़, मगर एक रूकावट है,
मेरे उसूल है, में गुनाहों की कमी पे नहीं लिखता...
समंदर को परखने का मेरा नजरिया हि अलग है यारों,
मिजाजो पे लिखता हूँ, उनकी गहेरइयो पे नहीं लिखता...
दूनिया का क्या है? हर हाल मै इलज़ाम लगाती है,
वरना क्या बात की मै अपनी सफाई पे नहीं लिखता...
तजुर्बा मेरी महोब्बत का ना लिखने की वजह बस यही है की,
शायर इश्क में खुद अपनी तबाही पे नहीं लिखता...
इससे ज्यादा क्या लिखो, जनता हूँ ज़माने को,
अपने पे लिखता हूँ, दुनियादारी पे नहीं लिखता...