जो बीत गए फिर वो ज़माने नहीं आते,
आते है, मगर लोग पुराने नहीं आते।
इस पेड कि हर शाखा तो, सुखी ही पड़ी है,
पँछी भी यहाँ रात बिताने नहीं आते।
में इस ज़माने दौर का, वीराना खंडर हुँ,
बच्चे भी यहाँ शोर मचाने, नहीं आते।
लकड़ी के मकानो में तुम, चिरागो को ना रखियो,
कि अब आग पड़ोसी भी बुझाने नहीं आते।
अपने ही मकानो में, हम तो पराये हैं,
अपने भी यहाँ ख़ुशी जताने नहीं आते।
जो बीत गए फिर वो ज़माने नहीं आते,
आते है, मगर लोग पुराने नहीं आते।
आते है, मगर लोग पुराने नहीं आते।
इस पेड कि हर शाखा तो, सुखी ही पड़ी है,
पँछी भी यहाँ रात बिताने नहीं आते।
में इस ज़माने दौर का, वीराना खंडर हुँ,
बच्चे भी यहाँ शोर मचाने, नहीं आते।
लकड़ी के मकानो में तुम, चिरागो को ना रखियो,
कि अब आग पड़ोसी भी बुझाने नहीं आते।
अपने ही मकानो में, हम तो पराये हैं,
अपने भी यहाँ ख़ुशी जताने नहीं आते।
जो बीत गए फिर वो ज़माने नहीं आते,
आते है, मगर लोग पुराने नहीं आते।
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