बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

•~ છેલ્લે તો આપણે બે જ હોઈશું


:•~ છેલ્લે તો આપણે બે જ હોઈશું

:•~ ભલે ઝગડીએ, ક્રોધ કરીએ, એકબીજા પર તુટી પડીએ,
     એકબીજા પર દાદાગીરી કરવા, છેલ્લે તો આપણે બે જ હોઈશું.
 

:•~ જે કહેવું હોય એ કહી લે, જે કરવું હોય એ કરી લે,
      એકબીજાનાં ચોકઠાં (ડેન્ચર–ચશ્માં) શોધવા છેલ્લે તો આપણે બે જ હોઈશું.
 

:•~ હું રીસાઈશ તો તું મનાવજે, તું રીસાઈશ તો હું મનાવીશ,
     એકબીજાને લાડ લડાવવા, છેલ્લે તો આપણે બે જ હોઈશું.
 

:•~ આંખો જયારે ઝાંખી થશે, યાદશક્તી પણ પાંખી થશે ત્યારે, 
       એકબીજાને એકબીજામાં શોધવા, છેલ્લે તો આપણે બે જ હોઈશું.
 

:•~ ઘુંટણ જ્યારે દુઃખશે, કેડ પણ વળવાનું મુકશે,
      ત્યારે એકબીજાના પગના નખ કાપવા, છેલ્લે તો આપણે બે જ હોઈશું.
 

:•~ ‘મારા રીપોર્ટસ્ તદ્દન નોર્મલ છે, આઈ એમ ઓલરાઈટ’,
       એમ કહીને, એકબીજાને છેતરવા, છેલ્લે તો આપણે બે જ હોઈશું.
 

:•~ સાથ જ્યારે છુટી જશે, વીદાયની ઘડી આવી જશે,
      ત્યારે, એકબીજાને માફ કરવા, છેલ્લે તો આપણે બે જ હોઈશ...

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2014

तसवीर


तसवीर से बतियाता, जब याद आती है। 
मेरे दिल कि धड़कन भी, तेरे गीत गति है।।

होंठो कि ये लाली, तेरी और बुलाती है। 
और मुस्कराहट भी, मुझे मुस्कुराती है।।

तेरी छोटी आँखों में, है राज़ कई गहरे। 
कानो कि ये बाली, तेरी और बुलाती है।।

जो केह रहा है दिल, वो समझ रही हो तुम। 
और ना समझके भी, कुछ समझ दिखती हैं।।

बुधवार, 27 नवंबर 2013

Jamane

जो बीत गए फिर वो ज़माने नहीं आते,
आते है, मगर लोग पुराने नहीं आते।

इस पेड कि हर शाखा तो, सुखी ही पड़ी है,
पँछी भी यहाँ रात बिताने नहीं आते।

में इस ज़माने दौर का, वीराना खंडर हुँ,
बच्चे भी यहाँ शोर मचाने, नहीं आते।

लकड़ी के मकानो में तुम, चिरागो को ना रखियो,
कि अब आग पड़ोसी भी बुझाने नहीं आते।

अपने ही मकानो में, हम तो पराये हैं,
अपने भी यहाँ ख़ुशी जताने नहीं आते।

जो बीत गए फिर वो ज़माने नहीं आते,
आते है, मगर लोग पुराने नहीं आते।


Bharosha

भरोसा मत करो, सांसो की डोरी टूट जाती है,
छते महफूज़ रहती है, हवेली टूट जाती है।

लड़कपन में किये वादों की कीमत कुछ नहीं होती,
अंगूठी हाथ में रहती है, मंगनी टूट जाती है।

किसी दिन त्याग के बारे में उनसे पूछिए जिसकी,
कुवे में बलती रहती है रस्सी छूट जाती है।

कभी कोई कलाई एक चूड़ी को तरसती है,
कही कंगन के झटके से कलाई टूट जाती है।

छते महफूज़ रहती है, हवेली टूट जाती है।

शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

चन्द अल्फाज़...

उनको ये शिकायात है में बेवफ़ाई पे नहि लिखता,
और में सोचता हूँ, उनकी रुसवाई पे नहीं लिखता...

खुद अपने से ज्यादा बुरा ज़माने में कोन है,
मै इस लिए औरों की बुराई पे नहीं लिखता...

कुच तो आदतों से मजबूर है, और खुद फितरतो की पसंद है,
ज़ख्म कितने भी गहरे हो, मै उनकी दुहाई पै नहीं लिखता...

शान-ए-अमीरी पे करू अर्ज़, मगर एक रूकावट है,
मेरे उसूल है, में गुनाहों की कमी पे नहीं लिखता...

समंदर को परखने का मेरा नजरिया हि अलग है यारों,
मिजाजो पे लिखता हूँ, उनकी गहेरइयो पे नहीं लिखता...

दूनिया का क्या है? हर हाल मै इलज़ाम लगाती है,
वरना क्या बात की मै अपनी सफाई पे नहीं लिखता...

तजुर्बा मेरी महोब्बत का ना लिखने की वजह बस यही है की,
शायर इश्क में खुद अपनी तबाही पे नहीं लिखता...

इससे ज्यादा क्या लिखो, जनता हूँ ज़माने को,
अपने पे लिखता हूँ, दुनियादारी पे नहीं लिखता...